एकांतवासी साधु थे कृष्ण बलदेव वैद

Noted Hindi writer Krishna Baldev Vaid

हिन्दी के जाने-माने लेखक कृष्ण बलदेव वैद का 6 फरवरी 2020 को अमेरिका के न्यूयॉर्क में निधन हो गया। बलदेव वैद आधुनिक हिन्दी गद्य-साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण लेखकों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 27 जुलाई 1927 को पाकिस्तान के एक छोटे कस्बे डिंगा में हुआ था। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. किया और हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की उपाधि हासिल की। आजादी के बाद देश के बंटवारे के समय वह भारत चले आए।

कृष्ण बलदेव वैद ने डायरी लेखन, कहानी और उपन्यास विधाओं के अलावा नाटक और अनुवाद के क्षेत्र में भी सराहनीय योगदान दिया है। अपनी रचनाओं में उन्होंने हमेशा नए और मौलिक-भाषाई प्रयोग किए जिनका हिन्दी के आधुनिक-लेखन में खास महत्व है। उन्होंने 10 उपन्यास, 15 कहानियां, 6 किताबें और 7 नाटक लिखे हैं। उनका पहला उपन्यास ‘उसका बचपन’ 1957 में प्रकाशित हुआ था, जो काफी चर्चित हुआ था। हालांकि, वैद ने अपने वास्तविक वर्णन को दोहराया नहीं, मगर 20वीं सदी के भारत के सबसे प्रायोगिक लेखकों में से एक बन गए। उनका उपन्यास ‘गुजरा हुआ ज़माना’ ( 1981) भारत के विभाजन के सदमे के बारे में है। ‘दूसरा न कोई’ (1992) उपन्यास एक वृद्ध लेखक का एकालाप है जो एक ढहते घर में अकेले मर रहा है। वैद ने अपने उपन्यास ‘काला कोलज’ और ‘माया लोक’ में कल्पना की सीमाओं को तोड़ दिया, जिसके कारण उन्हें उपन्यास विरोधी कहा जाता है। कृष्ण बलदेव वैद को उनके उपन्यास ‘विमल उर्फ जाएं तो जाएं कहां’ के कारण आलोचना झेलनी पड़ी थी। इस उपन्यास को अश्लील बताया गया था।

कृष्ण बलदेव वैद हिन्दी के ऐसे आधुनिक रचनाकार थे, विदेश में रहने के बावजूद जिनमें भाषा और लेखक के रूप में एक हिन्दुस्तानी का ही मन बसा रहा। उनकी अधिकाँश रचनाएं पश्चिम के परिवेश और मानसिकता को अपनी सर्जनात्मक-प्रेरणा नहीं मानती, जैसा कुछ सुपरिचित हिन्दी कथाकारों ने लगातार किया है। इसके ठीक उलट, कृष्ण बलदेव वैद, अपने देश के ठेठ मध्यमवर्गीय-मन को अपनी उन स्मृतियों, सरोकारों और विडंबनात्मक स्थितियों को ही बारम्बार खंगालते हैं, जो एक बदलते हुए समाज और आधुनिक मनुष्य के भीतर घुमड़ रही।

‘खाली किताब का जादू’ उनकी नई कहानियों का संकलन है और ‘प्रवास गंगा’ संकलन को उनकी प्रतिनिधि कहानियों का संकलन कहा जा सकता है। कृष्ण बलदेव वैद की हिंदी कथा-साहित्य में अपनी अलग लीक रही है। जिन दिनों हिंदी साहित्य में बाह्य-यथार्थ के अंकन को कथा-उपन्यास में ‘हिट’ होने का सबसे बड़ा फॉर्मूला माना जाता रहा, उन्हीं दिनों उन्होंने ‘उसका बचपन’ जैसा उपन्यास लिखा, जिसने निस्संदेह उनके लेखन को एक अलग ही पहचान दी। अपने लेखन के माध्यम से उन्होंने एक तरह से हिंदी कहानी की मुख्यधारा कही जानेवाली यथार्थवादी कहानियों का प्रतिपक्ष तैयार किया जिसमें स्थूलता नहीं सूक्ष्मता पर बल है। उनकी हिन्दी कहानियों में गहरी बौद्धिकता और विविधता है। पत्रकार-लेखक आशुतोष भारद्वाज अपने लेख में कहते हैं कि अगर कृष्णा सोबती मुखर थी और निर्मल वर्मा शांत थे तो एक वृहद और विहंगम संसार के असाधारण प्रणेता वैद एकांतवासी साधु थे।

वैद साहित्यिक संस्थानों से दूर रहे। शायद इसीलिए उन्हें पुरस्कार नहीं मिले। उन्होंने एक बार दिल्ली के हिंदी अकादमी के एकमात्र पुरस्कार से अपना नाम वापस ले लिया क्योंकि उनके नाम की घोषणा के बाद दिल्ली की तत्कालीन शीला दीक्षित सरकार ने पुरस्कारों पर पुनर्विचार करने का फैसला किया था, क्योंकि उनके लेखन में “अश्लीलता” की शिकायत थी।